पूंजी (Capital) – पूंजी की कमी, शेयर (अंश) और उसके प्रकार

सभी क्षेत्रों की तरह कृषि को भी पनपने के लिए पूंजी की आवश्यकता है। तकनीकी विस्तार ने पूंजी की इस आवश्यकता को और बढ़ा दिया है। लेकिन इस क्षेत्र में पूंजी की कमी बनी हुई है। छोटे किसान महाजनों, व्यापारियों से ऊंची दरों पर कर्ज लेते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में किसानों ने बैंकों से भी कर्ज लेना शुरू किया है। लेकिन हालात बहुत नहीं बदले हैं।

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पूंजी क्या है?

पूँजी (Capital) साधारणतया उस धनराशि को कहते हैं जिससे कोई व्यापार चलाया जाए। किंतु कंपनी अधिनियम के अंतर्गत इसका अभिप्राय अंशपूँजी से हैं; न कि उधार राशि से, जिसे कभी कभी उधार पूँजी भी कहते हैं।

प्रत्येक कंपनी के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपने सीमानियम में अंशपूँजी, जिसे रजिस्टर्ड, प्राधिकृत अथवा अंकित पूँजी कहते हैं, तथा उसके निश्चित मूल्य के अंशों में विभाजन का उल्लेख करे। प्राधिकृत पूँजी के कुछ भाग को निर्गमित (इशू) किया जा सकता है और शेष को आवश्यकतानुसार निर्गमित किया जा सकता है।

निर्गमित भाग के अंशों के अंकित मूल्य को निर्गमित पूँजी कहते हैं। जनता जिन अंशों के क्रय के लिए प्रार्थनापात्र दे उनके अंकित मूल्य को प्रार्थित पूँजी (Subscribed captial) तथा अंशधारियों द्वारा जितनी राशि का भुगतान किया जाए उसे दत्तपूँजी (Paid captial) कहते हैं।

अंश (Shares)

अंश भिन्न के समान भागों की संख्या को निरूपित करता है। आम तौर पर भिन्न का उपरी भाग अंश होता है। उदाहरण स्वरूप – 3/5 भिन्न में 3 अंश है। कंपनी चाहे तो नए अंश निर्गमित करके अंशूपूँजी में वृद्धि कर सकती है, सभी या कुछ पूर्णदत्त अंशों को स्कंधों में परिवर्तित कर सकती है सभी या कुछ अंशों को कम कीमत के छोटे अंशों में परिवर्तित कर सकती है अथवा जिन अंशों का निर्गमन न हुआ हो उन्हें निरस्त कर सकती है। ये सब परिवर्तन तभी संभव हैं जब अंतिर्नियमों (आर्टिकल्स ऑव असोसिएशन) में इनकी व्यवस्था हो।

Types of Shares (अंश के प्रकार)

अधिकतर कंपनियों में निम्न प्रकार के अंश होते हैं :

1. पूर्वाधिकार अंश (Preference shares)

इस श्रेणी के अंशधारियों को निश्चित दर से लाभांश प्राप्त करने का तथा कंपनी के समापन के समय पूँजी के पुनर्भुगतान का पूर्वाधिकार होता है। ऐसे अंश असंचीय हो सकते हैं। यदि अंश संचीय हों तो किसी वर्ष लाभ न होने के कारण इन्हें लाभांश न मिल सके तो वे इसे अगले वर्षों में भी लेने के अधिकारी हैं।

2. साधारण अंश (Equity shares)

भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 के अनुसार इन्हें समता अंश (Equity shares) कहते हैं, पूर्वाधिकार अंशधारियों के लाभांश के भुगतान अथवा पूँजी पुनर्भुगतान के पश्चात्‌ शेष पर इस श्रेणी के अंशधारियों का अधिकार होता है।

3. स्थगित अंश (Deferred shares)

इन्हें संस्थापकों के अंश अथवा प्रबंध अंश भी कहते हैं। साधारणतया ऐसे अंश कंपनी के संस्थापकों को ही निर्गमित किए जाते हैं। इस श्रेणी के अंशधारियों को लाभांश एवं पूँजी के पुनर्भुगतान का अधिकार अन्य सभी श्रेणियों के अंशधारियों के पश्चात्‌ मिलता है।

4. विमोचनशील पूर्वाधिकार अंश (Redeemable Preference shares)

साधारणतया किसी भी कंपनी को अपने अंश स्वयं क्रय करने का अधिकार नहीं होता। किंतु यदि कंपनी के अंतर्नियमों में ऐसा अधिकार हो तो कंपनी अधिनियम की व्यवस्थाओं के अनुसार ऐसे अंश भी निर्गमित किए जा सकते हैं जिनका विमोचन हो सकता हो अर्थात्‌ कंपनी ऐसे अंशों को वापस क्रय कर सकती है।

अंशधारियों की प्रत्येक श्रेणी के अधिकार भी भिन्न हो सकते हैं और साधारणतया इन अधिकारों की व्यवस्था कंपनी के अंतर्नियमों में होती है। अंतर्नियमों में इन अधिकारों में परिवर्तन करने का अधिकार होने पर इनमें परिवर्तन किया जा सकता है। अंतर्नियमों में ऐसी व्यवस्था न होने पर उनका संशोधन किया जा सकता है जिससे कंपनी को इन अधिकारों के परिवर्तन का अधिकार प्राप्त हो सके।

पूंजी की कमी

खुदरा व्यापार और अन्य क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के द्वार खोलने की कोशिश की सफाई में, प्रधान मंत्री व तथाकथित अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि अगर अपनी अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाना है तो अधिक मात्रा में विदेशी पूंजी जरूरी है। वे ऐसी धारणा बनाते हैं मानो हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था और उसकी वृद्धि की संभावनाओं में “पूंजी की कमी” की गंभीर समस्या है।

इस तर्क का प्रभावशाली खंडन हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के प्रवक्ता कॉमरेड प्रकाश राव ने मज़दूर एकता कमेटी द्वारा 21 अक्तूबर को आयोजित सम्मेलन में दिये अपने भाषण में किया था। उन्होंने ध्यान दिलाया था कि अपने देश में हर 100 डॉलर की विदेशी पूंजी के आगमन के लिये हिन्दोस्तानी पूंजी के 60 डॉलरों का बहिर्गमन होता है। कई हिन्दोस्तानी कंपनियों ने बहुत से देशों में खदानें और कारखाने खरीद लिये हैं। 2008-09 में पूंजी का निर्यात 19.4 अरब अमरीकी डॉलर पहुंच गया था। यह करीब 1 लाख करोड़ रु. के बराबर है। जैसा कि उन्होंने जोर दिया था, “अगर सच में पूंजी की कमी की इतनी चिंता है, तो प्रधान मंत्री टाटा, रिलायंस व दूसरे पूंजी के निर्यातकों को इतनी भारी मात्रा में पूंजी का निर्यात करने से रोकने के लिये कदम क्यों नहीं उठाते हैं?”

दो दशक पहले शुरू किये तथाकथित सुधारों के कार्यक्रम के ज़रिये, टाटा और अंबानी की अगुवाई में अपने देश के बड़े इजारेदार पूंजीपति घरानों ने पहले ही वैश्विक दर्जा पा लिया है। इसके उदाहरण इस्पात, रसायन व औषधि, कच्चे तेल की खोज तथा उसके शुद्धिकरण के उद्योगों में हैं। इन क्षेत्रों में वे विदेशों में पूंजी निवेश कर रहे हैं ताकि वे पूंजी की सघनता, उत्पादन के पैमाने व विभिन्न क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकों से लैस होकर वैश्विक दर्जा पा सकें। उन्होंने यूरोप व उत्तरी अमरीका में कंपनियां खरीदी हैं तथा पूर्वी एशिया, लातिन अमरीका व मध्य एशिया में तेल के कुएं खरीद रहे हैं। वैश्विक पूंजीवादी इजारेदारों के साथ होड़ व मिलीभगत से, वे अपनी वैश्विक मौज़ूदगी स्थापित करने तथा विश्व बाजार में अपना हिस्सा बढ़ाने और कच्चे माल के स्रोतों पर अपना नियंत्रण जमाने के भरसक प्रयास कर रहे हैं।

अपने देश के ऐसे क्षेत्रों में जहां पूंजी की सघनता का स्तर व उत्पादन का पैमाना अंतर्राष्ट्रीय मानकों से पीछे है, बड़े पूंजीपति उनमें दुनियाभर के सबसे बड़े इजारेदारों को यहां आने व पूंजी निवेश करने के लिये आकर्षित करना चाहते हैं, ताकि वैश्विक मानकों को जल्दी से जल्दी पाया जा सके। यही कारण है कि वे खुदरा व्यापार और बीमा व पेंशन निधि के व्यवसायों में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिये आतुर हैं।

खुदरा व्यापार में, हिन्दोस्तानी इजारेदार घराने विशाल वैश्विक कंपनियों के सांझेदार बनना चाहते हैं ताकि देश और विश्व स्तर पर तेज़ी से अपना कारोबार बढ़ा सकें। घरेलू खुदरा बाज़ार को वॉल-मार्ट व दूसरे वैश्विक इजारेदारों के लिये खोलने से, न केवल अपने देश में भारी मात्रा में विदेशी पूंजी आयेगी, बल्कि अपने देश से भारी मात्रा में पूंजी बाहर देशों में भी जायेगी।

गाडि़यों व उसके पुर्जों का उत्पादन, बी.पी.ओ. व कॉल सेंटरों के साथ सेवाओं का निर्यात, कुछ ऐसे क्षेत्र हैं – जिनमें दुनिया के सबसे बड़े इजारेदारों के लिये हिन्दोस्तान को “सबसे पसंदीदा मंजिल” बनाने के लिये पहचाना गया है। मज़दूरों को उनके अधिकारों से वंचित करने, ताकि विदेशी पूंजीवादी इजारेदारों द्वारा अति शोषण करने के लिये कौडि़यों के मोल श्रम उपलब्ध हो, इस लक्ष्य के लिये केन्द्र व राज्य सरकारें एक साथ मिल कर काम कर रही हैं।

हाल में नीतियों में बदलाव का असली उद्देश्य, हमारी जनता के शोषण को तीव्र करना और श्रम व भूमि की लूट-खसौट बढ़ाना है, ताकि विदेशी इजारेदारों और टाटा, रिलायंस, बिड़ला व अन्य हिन्दोस्तानी इजारेदार घरानों का मुनाफा प्रचूर हो सके। अपने देश के बड़े पूंजीपति, प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी के आगमन को बढ़ावा देना चाहते हैं, ताकि वे विदेशों में अपना बाज़ार और वर्चस्व बढ़ा सकें। आर्थिक नीति उनके द्वारा तय की जा रही है जिनका विश्वास है कि हर हालत में हिन्दोस्तानी बड़े व्यवसायों का अधिकतम संवर्धन करना जरूरी है चाहे दूसरों को इससे कितना भी नुकसान क्यों न हो।

अपनी अर्थव्यवस्था में पूंजी की कमी मुख्य समस्या नहीं है। मुख्य समस्या है कि अर्थव्यवस्था को मेहनत करने वाले अधिकांश लोगों की जरूरतों की बली चढ़ाकर, मुट्ठीभर अतिअमीर अल्पसंख्या के असीमित लोभ और साम्राज्यवादी लक्ष्य के लिये दौड़ाया जा रहा है।

अपने लोभी और साम्राज्यवादी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये, अपने देश के बड़े पूंजीपतियों ने एक ऐसा रास्ता अपनाया है, जिससे विदेशी साम्राज्यवादी वर्चस्व और अपने देश की लूट-पाट बढ़ेगी।

पूंजी की कमी से होने वाली हानियाँ

उद्योग, थोक कपड़ा व्यापारियों के सामने बिक्री का संकट, पूंजी की कमी से उद्योग, थोक कपड़ा व्यापारियों के सामने बिक्री का संकट

वर्षा का सीजन, एक नंबर की पूंजी का अभाव, ग्रामीण इलाकों के खेरची व्यापारियों द्वारा जीएसटी में रजिस्ट्रेशन नहीं कराने से कपड़ा व्यापार की स्थिति फिलहाल ठीक नहीं है। मुंबई, अहमदाबाद आदि में कपड़ा उत्पादन प्रभावित हुआ है। राखी और रमजान के लिए तैयार किया गया, कपड़ा मिलों अथवा व्यापारियों के गोदामों रखा रह गया हैं। भीलवाड़ा में प्रोसेस हाउसों की हालत खराब हैं। दिपावली त्योहार नजदीक आ रहा है, किंतु बाजारों में अभी तक बड़ी हलचल दिखाई नहीं दे रही है। खेरची व्यापारियों का भुगतान वापस आया तो ब्याह-शादियों के सीजन में व्यापार की कड़ी जुड़कर व्यवस्थित रूप से चलने लगेगी। हाल ही में हो रही मानसून की वर्षा से खरीफ के साथ रबी का भविष्य भी उज्ज्वल नजर आने लगा है।

जीएसटी लागू होने के बाद आए दिन कपड़ा उद्योग और व्यापारियों की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। सबसे बड़ी दिक्कत ग्रामीण इलाकों में कपड़ा बेचने वाले खेरची व्यापारियों के यहां आ रही है। हजारों खेरची व्यापारियों ने जीएसटी में रजिस्ट्रेशन नहीं कराया हैं। इस वजह से थोक व्यापारी कपड़ा किसे बेचे। बिना रजिस्ट्रेशन बेचने वालों को कपड़ा बेचने से रहे। इसका प्रभाव यह पड़ रहा है कि मिलों में भी कपड़े का भरावा बढ़ता जा रहा है।

नकद का व्यापार बंद

जीएसटी लागू होने के बाद नकद का व्यापार लगभग समाप्त हो गया है। पूर्व में अनेक व्यापारी 50 प्रतिशत एक नंबर में और 50 नंबर दो नंबर में व्यापार कर लेते थे। अब दो नंबर का रुपया तो बाजार से बाहर हो गया। एक नंबर की इतनी पूंजी नहीं है कि पूर्व के समान बड़ी मात्रा में व्यापार कर सके, जिससे पूंजी के अभाव में व्यापार बिना कुछ करे 50 प्रतिशत रह गया। ब्याज का रुपया भी अब हर किसी को नहीं मिलता है। क्योंकि अनेक व्यापारियों ने नकद में रुपया उधार लिया था, उन्होंने प्रापर्टी, कॉटन अनाज, किराना या अन्य किसी क्षेत्र में लगा दिया था, वह रुपया वही जाम हो गया है। हुंडी वालों को मूल पूंजी देने से रहे, ब्याज का भुगतान भी नहीं किया जा रहा है, जिससे अनेक पार्टियों की हालत न केवल मप्र में वरन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली और उप्र में भी खराब है। ऐसे में ब्याज से रुपया देने वालों ने हाथ खींच लिया है, विश्वास भी डगमगा गया है। वर्तमान में स्थिति यह बन गई है कि कौन-सी पार्टी की स्थिति कमजोर अथवा सुदृढ़ है, यह पता लगाना कठिन हो गया।

कपड़ा उत्पादन प्रभावित

मुंबई, अहमदाबाद में कपड़ा उत्पादन प्रभावित हुआ है। मिलों ने उत्पादन में कटौती कर दी है। फिर कम उत्पादन के बाद भी तैयार माल की बिक्री कम मात्रा में हो रही है। भीलवाड़ा में भी सन्नाटे जैसी स्थिति है, किंतु मिलें 60 प्रतिशत उत्पादन कर रही है। 40 प्रतिशत लूम जॉब वर्क कर रहे हैं। भीलवाड़ा में जॉब वर्क मिलने में दिक्कत नहीं आती है। अनेक व्यापारी अपने हिसाब से कपड़ा तैयार कराकर बेचते हैं, जिससे थोड़ी बहुत मात्रा में जॉब वर्क चलता रहता है। पीक की दर 11-12 पैसे चल रही है, जबकि प्रोसेस हाउसों की हालत खराब है। उन्हें तैयार कपड़ा नहीं मिल रहा है।

बड़ी मात्रा में स्टॉक रह गया

जानकारों का मत है कि देश की कपड़ा मिलों ने राखी, रमजान हेतु कपड़ा उत्पादन कर तैयारी की थी, उसमें से बड़ी मात्रा में कपड़ा मिलों के पास स्टॉक में रह गया है। दिपावली में केवल 46-48 दिन शेष रह गए हैं, किंतु कपड़ा बाजारों में अभी तक कोई हलचल सुनाई नहीं दे रही है। कपड़ा बाजारों में दिपावली त्योहार की ग्राहकी आगामी 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक चलने की आशा व्यक्त की जा रही है। एक माह में कितनी ग्राहकी निकलेगी, यह विचारणीय विषय है। आम धारणा है कि दिपावली पर 35 से 40 प्रतिशत से अधिक ग्राहकी चलने की उम्मीद नहीं करना चाहिए। बाजार धन की तंगी से ग्रस्त है, जिससे लगभग सभी बाजारों ग्राहकी औसत से कम ही चल रही है।

भुगतान समय से आना जरूरी

थोक व्यापारियों का मत है कि दिपावली बाद खेरची व्यापारियों का भुगतान समय से एवं व्यवस्थित तौर पर आता है तो आगामी ब्याह-शादियों के समय ग्राहकी जम जाएगी, यदि भुगतान में देरी हुई और कम मात्रा में आया तो अगली कड़ी टूट जाएगी। बाजार में यह भी चर्चा है कि बड़े बाजारों का रुपया भी डूबा है, जिससे अंदरूनी रूप से व्यापारी खोखले हो गए, जिससे भी बाजारों में कामकाज की मात्रा कम होना स्वाभाविक है।

कपड़ा व्यापारी बिना किसी कारण दहशत में

वर्षा का सीजन पर्युषण की वजह से कपड़ा बाजार में ग्राहकी कमजोर ही रहती है। थोक खेरची कपड़ा बाजारों की चर्चा सुनकर व्यापारी बिना किसी कारण दहशत में आ गए। बाजार पर नोटबंदी के बाद जीएसटी का प्रभाव दिखाई दे रहा है। छोटी-छोटी यूनिटें जैसे-तैसे अपना कारोबार चला लेती थी, वह भी या तो बंद हो गई हैं अथवा बंद होने के कगार पर हैं। छोटी यूनिटों को बाजार से उधारी में रुपया मिल जाता था, वह भी मिलना बंद हो गया है, जिससे भी यूनिटों का कमजोर होना स्वाभाविक है। भीलवाड़ा की एक बड़ी मिल पर आयकर को छापे की कार्रवाई 5 दिन तक चली।

पिछले दिनों मुंबई में त्योहारी सीजन की शुरुआत हो गई तो अभी ग्राहकी न केवल कमजोर है, बल्कि दमहीन बनी हुई है। अभी तक छोटे-बड़े ब्रांड गारमेंट में स्टॉक अधिक होने और ग्राहकी कमजोर होने और मंदी से जूझ रहे गारमेंट उद्योग को जीएसटी काउंसिल से राहत मिली है। जॉब वर्क पर दरों में कमी कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि कपड़ा उद्योग में अधिकांश हिस्सों के उत्पादन की प्रवृत्ति जॉबवर्क के मार्फत चलने की है। जीएसटी दर घटा देने से उद्योग पर सकारात्मक असर पड़ने वाला है। इससे टेक्सटाइल क्षेत्र में वैल्यू चैन की लागत कम होगी।

पूंजी की कमी 25 फीसदी उत्पादन गिरा

पूंजी की कमी से एचइसी के उत्पादन में 20- 25 प्रतिशत की गिरावट आयी है। एचइसी के पास कार्यादेश बढ़ रहे हैं, लेकिन पूंजी नहीं रहने के कारण कच्चा माल एवं अन्य संसाधन नहीं मिल रहे हैं। पूंजी के लिए एचइसी ने केंद्र, झारखंड सरकार के साथ- साथ बैंकों से भी बात कर रहा है। झारखंड सरकार ने पैकेा के लिए मंजूर राशि में से 100 करोड़ अग्रिम देने की बात कही है। संबंधित फाइल सीएम के पास पड़ी है।

यदि राज्य सरकार से यह राशि मिल जाती, तो एचइसी की परशानी कम होती। उधर बैंकों से भी एचइसी को खास सहयोग नहीं मिल पा रहा है। बैंकों का कहना है कि वह लोन तभी देगा एचइसी का नेटवर्थ पॉजिटीव होगा। अगले माह से काम करगा इएसआइ अस्पताल एचइसी के ठेका श्रमिकों के लिए बने इएसआइ ओपीडी के हैंडओवर- टेकओवर का काम अगले माह में हो जायेगा।

यह जानकारी स्वास्थ्य सचिव ने दी। सिंह ने बताया कि स्वास्थ्य मंत्री भानू प्रताप शाही इस अस्पताल का उद्घाटन करंगे। मृत कर्मचारयों के आश्रितों की बैठक कल एचइसी के मृत कर्मचारियों के आश्रितों का धरना 378 दिनों से जारी है, लेकिन इनकी मांगों पर अभी तक विचार नहीं हो सका है। झारखंड जन शक्ित मजदूर यूनियन ने 28 मई को तमाम प्रभावित लोगों की बैठक बुलायी है।

यूनियन के कार्यकारी अध्यक्ष जीवेश सिंह सोलंकी ने 11 बजे से होने वाली बैठक में सभी से उपस्थित होने की अपील की है। पिल्लइ का एक साल पूरा एचइसी के सीएमडी जीके पिल्लइ 27 मई को एक साल का कार्यकाल पूरा करंगे। उनके नेतृत्व में एचइसी ने प्रगति की है। मुनाफा कमाया। एचइसी का टर्न ओवर व मुनाफा भी बढ़ा। पिल्लइ ने कहा: उन्हें सभी का सहयोग मिला है।

पे रिवीजन व पूर्व कर्मचारियों का बकाया भुगतान नहीं करने का उन्हें मलाल है। बैठक तीन को एचइसी के निदेशक मंडल की बैठक तीन जून को होगी। बैठक में एलटीएल का मामला भी लाया जा सकता है। इसके अलावा कई रूटिन मामलों को पास कराया जायेगा।

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